' यदा यदा ही धर्मस्य 'अनामिका सिन्हा पाठक "अर्श"
Ghaziabad :- खामोश हूँ मैं
मुझे खामोश ही रहने दो
बोल पड़ी तो
बहुतों की बोलती बंद हो जायेगी।
नकाबों की परत दर परत
चढ़ाते जाओ अपने चेहरे पर
मुझे क्या गर्ज कि मैं
तुम्हें बेनकाब करने की जहमत करूँ
इक दिन आएगा जब
आईना ही तुम्हें पहचानने
से कर देगा इनकार
फिर करते रहना अपने
वास्तविक रूप की तलाश
समझो तुम मेरी चुप्पी को
मेरी कमजोरी
मैं चाहती भी यही हूँ
तभी तो तुम्हारा सम्पूर्ण स्वांग
मेरे सामने आएगा।
षड्यंत्रों से गर प्राप्त होती
सत्य पर विजय
तो बेमानी हो जाते आज
गीता/रामायण के उपदेश
कृष्ण नहीं दुर्योधन
राम नहीं रावण पूजे जाते
बेशक तुम आज
जी भर के कर लो प्रताड़ित /अपमानित मुझे
उड़ा लो मेरा सार्वजनिक उपहास
लेकिन तुम्हारी बेचैनी कहती है कि
भयभीत हो तुम अपने अंजाम से
कर्मण्ये वाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन
कृष्ण के गीता ज्ञान से
तभी तो जुटा रखी है
तुमने सशस्त्र कौरवों की सेना
अकेली निहत्थी हूँ मैं
पर असहाय नहीं
शिवशक्ति हैं साथ मेरे
निश्चिंत हूँ मैं
विधि के विधान से
सत्यमेव जयते पर है
मुझे अखण्ड विश्वास
मिथ्या नहीं है कृष्ण का
गीता उवाच।
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