दर्द से जन्मी मेरी कविता

दर्द से जन्मी मेरी कविता


Ghaziabad :- दो हजार पच्चीस के प्रारम्भ में,
मैंने नई उमंगें संजोई थीं।
नए सपनों की एक शुरुआत,
नन्ही आँखों में बोई थीं।
पर उसी आरंभिक मोड़ पर,
ज़िंदगी ने ऐसा मोड़ लिया—
सिर से पिता का साया,
पल भर में उठ गया।
कुछ समझ पाती उससे पहले,
हर राह ने मुझे अकेला छोड़ दिया।
अंदर से पूरी तरह टूट गई थी मैं,
गिरकर भी खुद को संभाला।
आँसुओं के सैलाब में दबकर,
खामोशी से दर्द को पाला।
फिर उन्हीं टूटे क्षणों के बीच,
मैंने हिम्मत को फिर पहचाना—
जीने का अर्थ तलाशा,
खुद को दोबारा जाना।
इसी अँधेरे सफ़र में,
पिता की आवाज़ आई—
“बेटी!” अपने मन को लिखो,
अपने दिल की सुनवाई।
कोरे पन्नों को भिगो दो,
कोमल हृदय की करुणा से,
दर्द को शब्दों में ढालो,
सच की पूरी सरुणा से।
तभी कविता मेरी साथी बनी,
पीड़ा ने रचना सिखलाई।
हृदय के घावों से निकले शब्दों ने,
मुझे मेरी पहचान दिलाई।
दो हजार पच्चीस भले ही दुखद रहा,
पर इसी ने मेरी आवाज़ जगाई।
अब चाहती हूँ, इस वर्ष के अंत में,
मेरा सृजन मेरी स्वर बने।
दर्द से जन्मी मेरी कविता,
किसी और की ताक़त बने।
अदिती कुशवाहा*
*बैकुंठपुर (कोरिया), छत्तीसगढ़*