श्रम संहिताओं के खिलाफ सीटू ने नुक्कड़ सभा कर मजदूरों से 26 नवंबर को जंतर मंतर नई दिल्ली पहुंचने की अपील किया- गंगेश्वर दत्त शर्मा

श्रम संहिताओं के खिलाफ सीटू ने नुक्कड़ सभा कर मजदूरों से 26 नवंबर को जंतर मंतर नई दिल्ली पहुंचने की अपील किया- गंगेश्वर दत्त शर्मा

ग्रेटर नोएडा, मजदूरों पर गुलामी लादने के लिए लागू किए गए मजदूर विरोधी लेबर कोड़ों के खिलाफ सीटू द्वारा चलाए जा रहे अभियान के तहत आज अनमोल इंडस्ट्री उद्योग विहार ग्रेटर नोएडा पर सीटू जिला अध्यक्ष मुकेश कुमार राघव के नेतृत्व में मजदूरों ने गेट पर विरोध प्रदर्शन किया। विरोध प्रदर्शन को संबोधित करते हुए सीटू नेता मुकेश कुमार ने कहा कि मोदी सरकार ने मालिकों से यारी और मजदूरों से के साथ गद्दारी करते हुए लेबर कोड लागू किए हैं जिसका मजदूर संगठन कड़ा विरोध कर रहे हैं। 26 नवंबर 2025 को देशभर में जहां विरोध प्रदर्शन होंगे वहीं गौतम बुद्ध नगर, गाजियाबाद व दिल्ली के मजदूर जंतर मंतर नई दिल्ली पर जोरदार प्रदर्शन कर श्रम संहिताओं को रद्द करने की मांग की जाएगी। उन्होंने ज्यादा से ज्यादा संख्या में जंतर मंतर नई दिल्ली पहुंचने की अपील मेहनतकश लोगों से किया।
नोएडा में एक बैठक को संबोधित करते हुए सीटू जिला सचिव गंगेश्वर दत्त शर्मा ने कहा कि मजदूर कानूनों को बदलने की कोशिश में लगी और बहुत दिनों से कोशिश करती आ रही वर्तमान केंद्र सरकार अपने प्रयासों में सफल हो गई है। उसने 29 केंद्रीय श्रम कानूनों को बदलकर चार श्रम संहिताएं लागू करने की घोषणा कर दी है और सरकार इन काले कानूनों को प्रगतिशील और मजदूरों के हित में बता रही है जबकि हकीकत में ऐसा कुछ भी नहीं है। ये चारों काले कानून बिल्कुल भी करोड़ों मजदूर के हित में नहीं हैं। 
    इन चार काले कानूनों के दुष्परिणाम बहुत भयंकर होने जा रहे हैं। इन कानूनों के लागू होने के बाद कार्य दिवस 12 घंटे का कर दिया गया है, निश्चित और स्थायी अवधि की नौकरी खत्म कर दी गई है, मजदूरों का यूनियन बनाने का अधिकार और उनका हड़ताल करने का अधिकार लगभग खत्म कर दिया गया है। अब मुनाफे के भूखे उद्योगपतियों द्वारा मजदूरों को शोषण और जुल्म की जंजीरों में बंद कर दिया गया है। अब उन्हें मालिकान द्वारा जब चाहे तब नौकरी से निकाला जा सकता है और हमारे करोड़ों नौजवानों के स्थाई नौकरी के सपनों का विनाश और खात्मा कर दिया गया है।
     प्रधानमंत्री का यह कहना कि ये कानून श्रमिकों से जुड़े सुधारवादी और बहुत प्रगतिशील हैं, बिल्कुल गलत और निराधार हैं। ये समस्त कानून एकदम मजदूर विरोधी काले कानून हैं । ये चारों कानून श्रमिकों/मजदूरों को ब्रिटिश कालीन युग में ले जाएंगे।इन श्रम कानूनों ने मजदूरों का कार्य दिवस 8 घंटे से बढ़ाकर 12 घंटे कर दिया गया है, जो किसी भी स्थिति में जायज नहीं है। जबकि 1917 की रूसी क्रांति के बाद दुनिया में सबसे पहली दफा मजदूरों के लिए 8 घंटे का काम, 8 घंटे का विश्राम और 8 घंटे अपनी संस्कृति में इजाफा करने के लिए नियत किए गए थे। इन काले कानूनों ने यूनियन बनाना असंभव कर दिया गया है, मजदूरों के वेतन बढ़ाने के अभियान और हड़ताल के अधिकार को लगभग असंभव बना दिया है। भारत की जनता और किसानों मजदूरों ने अपनी जान की बाजी लगाकर अंग्रेजों से यूनियन बनाने और हड़ताल करने का अधिकार प्राप्त किया था। सरकार ने उन्हें सेवायोजकों के कहने और दबाव में एकदम खत्म कर दिया है।
    इन चार काले श्रम कानूनों को लाकर सरकार ने अंग्रेजों को भी पीछे छोड़ दिया है। उसने मजदूरों के साथ खुलेआम धोखाधड़ी करके, इन कानूनों को लाकर मजदूरों को, मुनाफे के भूखे पूंजीपतियों का फिर से भयंकर शिकार और गुलाम बना दिया है और उनके पैरों में शोषण और अन्याय की जंजीरें डाल दी हैं। ये चारों श्रम संहिताएं पूरी तरह से मजदूर विरोधी हैं जो मौजूदा समस्त श्रम सुविधाओं को छीनने वाले हैं। ये चारों श्रम कानून उद्योगपतियों के कहने पर और उनके दबाव में, उनके मुनाफे को बढ़ाने के लिए लाये गए हैं। इन मजदूर विरोधी कानूनों के लागू होने पर मजदूरों को काम पर रखना और निकालना सेवायोजकों के लिए बहुत आसान और मनमाना हो जाएगा। इन कानूनों को लागू होने पर ले ऑफ, छटनी और मिलबंदी के लिए सरकार की इजाजत लेने की जरूरत खत्म कर दी गई है और अब कारखानों में मजदूरों की संख्या 100 से बढ़कर 300 कर दी गई है।
     ये कानून कारखानेदारों को इस बात की इजाजत देते हैं कि अब मजदूरों को बड़ी संख्या में बिना किसी प्रकार का मुआवजा दिए और रिटायरमेंट की सुविधा और पेंशन दिए बिना ही नौकरी से निकाला जा सकता है। इन काले कानूनों ने स्थाई नौकरी की व्यवस्था को खत्म कर दिया है। अब अधिकांश नौकरियों का ठेका कारण कर दिया गया है। अब मजदूरों को छोटी-छोटी निश्चित अवधि के लिए काम पर रखा जाएगा लेकिन उन्हें लंबी अवधि की मिलने वाली सुविधाओं और सुरक्षाओं से वंचित कर दिया जाएगा। इन परिस्थितियों से स्थाई रोजगार में कमी आएगी और मजदूरों का अस्थाईकरण बढ़ जाएगा जिससे नौजवानों के स्थाई नौकरियों के सपने धराशाई हो जाएंगे। उनमें से अधिकांश का वेतन और आमदनी घट जाएगी। इससे मजदूर किसानों की नौजवान पीढ़ियों का भविष्य बर्बाद हो जाएगा और वे विनाश और तबाही के गड्ढे में गिर जाएंगे।
     इन चारों काले कानूनों में नाम के अलावा, कुछ भी नया प्रगतिशील और लाभदायक नहीं है। इनसे मजदूरों को नई मनमानी और कानूनविहीन नयी जंजीरों में बांध दिया गया है, उनसे सारे प्रगतिशील कानून और अधिकार छीन लिए गए हैं और मजदूरों को गुलामी का नया कानूनीजामा पहना दिया गया है। इनसे मजदूरों का मनमाना शोषण, जुल्म और अन्याय बढ़ेगा, तमाम अमीरों और औद्योगिक घरानों, सेवायोजकों और कारखाना मालिकों का बेतहाशा मुनाफा बढ़ेगा। 
    इन कानूनों के लागू होने के बाद सरकार और पूंजीपतियों की श्रम न्यायालय में भी दखलअंदाजी बढ़ जाएगी। अब श्रम कानून में पीठासीन अधिकारियों की नियुक्तियों में अमीरों और सरकार का मनमानापन और दखलअंदाजी बढ़ जाएगी और अब मजदूरों को न्याय से वंचित किया जाएगा और उन्हें मनमाने अन्याय का शिकार बनाया जाएगा। इससे सेवायोजकों के अन्याय और मनमानेपन का साम्राज्य बढ़ेगा और ज्यादा मजबूत होगा। इन कानूनों के लागू होने से संविधान की मौजूदगी में ही संविधान का खात्मा कर दिया गया है। 
       यहां पर यह बात भी गौर करने वाली है कि आरएसएस से जुड़ी भारतीय मजदूर संघ यानी बीएमएस को छोड़कर, देश के बाकी 10 केंद्रीय मजदूर संघों ने इन कानून का जबरदस्त विरोध किया है और सरकार से उन्हें तत्काल वापस लेने की मांग की है। इन 10 मजदूर संघों में सीटू, एटक, इनटक, एचएमएस, टीयूसीसी, एसईडब्लूए, आइसीसिटीयू, एलपीएफ और एटीयूसी शामिल हैं 
    सरकार ने मनवाने एकतरफा और गैरजनतांत्रिक रूप से इन काले कानूनों को बनाया है। यह भारतीय राज्य के कल्याणकारी चरित्र पर सबसे बड़ा हमला है। वर्तमान 29 केंद्रीय कानून को खत्म कर दिया गया है। इनका उद्देश्य सिर्फ और सिर्फ उद्योगपतियों के मुनाफों को बढ़ावा देना है। सरकार ने इन कानूनों को बनाने से पहले, मजदूरों या इन 10 केंद्रीय मजदूर संगठनों की लगातार कोशिशों के बाद भी, उनसे कोई चर्चा और बातचीत नहीं की, उनसे कोई सलाह मशविरा नही किया और उन्हें कभी भी समुचित विश्वास में नहीं लिया है।
      भारत के 29 श्रम कानून बिल्कुल प्रगतिशील, न्यायिक और मजदूर समर्थक और हितकारी थे। बस उनसे सेवायोजकों को ही परेशानी हो रही थी। सरकार इन्हें क्यों लागू नहीं कर रही थी?, इसका सरकार के पास कोई जवाब नहीं है। हकीकत यह है कि भारत के 85% मजदूरों को सेवायोजकों द्वारा न्यूनतम वेतन नहीं दिया जा रहा था। दरअसल यह सरकार मजदूर हितकारी नहीं, बल्कि पूंजीपतियों की मुनाफाखोरी को बढ़ाने वाली और उनके इशारों पर ही काम करने वाली सरकार है। इसलिए इन पूंजीपति हितकारी और मजदूर विरोधी काले कानूनों को लेकर आई है। अब देश के किसानों, मजदूरों, तमाम मेहनतकशों, नौजवानों और छात्रों के पास केवल एक ही चारा बचा है कि वे एकजुट होकर पूरी ताकत और मजबूती के साथ सरकार की इन मनमानी और मजदूर विरोधी गतिविधियों का मुकाबला करें और सरकार को इन किसानों, मजदूरों मेहनतकशों, नौजवानों और जन विरोधी कानूनों को वापस लेने को मजबूर करें, केवल तभी सरकार और पूंजीपतियों द्वारा थोपी जा रही नई गुलामी, शोषण और अन्याय से छुटकारा पाया जा सकेगा। इसके अलावा और कोई चारा और रास्ता नहीं है और वे सब मिलकर संगठित और शिक्षित होकर, जोरदार तरीके से कहें,,अब तो मिलजुल कर, ही टकराने का इरादा है, नतीजा कुछ भी निकले आज बगावत का इरादा है।