जांजगीर-चांपा, छत्तीसगढ़ समाज में बदलाव और अखंडता की पुकार डॉ. क्षमा पाटले “अनंत” की यह सशक्त कविता स्त्री संवेदना, सामाजिक अन्याय और मानवता के विघटन के विरुद्ध एक सशक्त स्वर है। इसमें कवयित्री ने गुलाब की कोमलता से ऊपर उठकर इंकलाब की पुकार दी है — जो अन्याय, विभाजन और हिंसा के विरुद्ध जनजागरण का संदेश देती है।
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ज़मीं पर बहते हुए लहू का हिसाब चाहती हूं,
अब मैं गुलाब नहीं, इंकलाब चाहती हूं।
खुदा खैर करे, लोगों में इंसानियत बाकी तो है,
मैं जहां में वफ़ा के नतीजे लाजवाब चाहती हूं।
मुझे ऐतराज़ नहीं तेरे तख़्तों ताज से,
मैं बेपनाहों पर रहमत बेहिसाब चाहती हूं।
लोगों की भीड़ में खुद को तन्हा सा पाती हूं,
हर तरफ धोखा है, सन्नाटा है — सोचकर सिहर जाती हूं।
धर्म, जाति, मजहब की दीवारें बहुत ऊंची हैं “क्षमा”,
मैं राष्ट्र में अखंडता का विजय शंखनाद चाहती हूं!
ज़मीं पर बहते हुए लहू का हिसाब चाहती हूं,
अब मैं गुलाब नहीं, इंकलाब चाहती हूं!
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