जीवन की हर राह आसान नहीं होती।

जीवन की हर राह आसान नहीं होती।
Ghaziabad :- कुछ रास्ते ऐसे भी होते हैं जहाँ कदमों के साथ कोई नहीं चलता, पर फिर भी यात्रा पूरी करनी होती है। पिता के न होने पर जब बच्चे जवान हो रहे हों, तब एक माँ की जिम्मेदारी कई गुना बढ़ जाती है। वह माँ ही होती है जो आँधियों में भी दीपक की तरह जलती रहती है — अपने बच्चों के लिए, उनके भविष्य के लिए। 
जब पति का सहारा अचानक छिन जाता है, तो माँ के सामने सिर्फ़ एक सवाल होता है — अब आगे क्या?
बच्चों की आँखों में उठते प्रश्न, उनके भविष्य की चिंता, और समाज की कड़वी बातें — सब एक साथ उस पर टूट पड़तीं हैं।
पर धीरे-धीरे वही माँ अपने भीतर की ताकत पहचानती है।
वह समझ जाती है कि अगर वह हिम्मत हार गई, तो पूरा घर बिखर जाएगा।
यहीं से शुरू होती है एक माँ की नायिका बनने की कहानी।
जवान होते बच्चे संवेदनशील और उग्र दोनों होते हैं।
कभी उन्हें लगता है कि माँ बहुत रोकती है, तो कभी माँ को लगता है कि बच्चे हाथ से फिसल रहे हैं।
ऐसे में माँ कभी कठोर शब्दों से तो कभी स्नेहभरी दृढ़ता से मार्गदर्शन करती है।
वह माँ जो डांटते हुए भी समझाती है, और समझाते हुए भी डांटती है — वही बच्चों के मन में गहरी जड़ें जमाती है।
अकेली माँ को दोहरी लड़ाई लड़नी पड़ती है — एक समाज से और दूसरी परिस्थितियों से।
उसे यह सिद्ध करना पड़ता है कि वह अकेली होकर भी सब कुछ संभाल सकती है।
चाहे नौकरी करना हो, घर चलाना हो, या बच्चों की पढ़ाई के खर्च उठाने हों —
वह हर ज़िम्मेदारी निभाती है, बिना किसी शिकायत के।
उसका हर कदम बच्चों के लिए एक प्रेरणा बन जाता है कि जीवन में मुश्किलें आएँ, पर हारना नही।माँ जानती है कि वह पिता की जगह नहीं ले सकती, पर वह बच्चों के जीवन में पिता का आदर्श जीवित रखती है।
वह कहती है — “तुम्हारे पापा ने जो सिखाया, वही आगे बढ़ाना।”
इस तरह पिता का अभाव बच्चों के भीतर कमी नहीं, बल्कि एक प्रेरणा बन जाता है।
अकेली माँ अगर खुद को भूल जाए, तो घर का संतुलन भी डगमगाता है।
इसलिए वह अपने मन को भी स्थिर रखती है —
कभी प्रार्थना में, कभी किताबों में, कभी प्रकृति की गोद में।
तभी माँ भीतर से शांत होती है, तभी घर में सच्ची शांति आती है।
--अकेली माँ की कहानी करुणा की नहीं, साहस की कहानी है।
वह माँ जो आँसुओं को मुस्कान में बदलना जानती है,
जो पिता की कमी में भी बच्चों को पूरा आकाश देना जानती है,
वही सच्चे अर्थों में जीवन की निर्माता है।
ऐसी हर माँ को मेरा प्रणाम —
क्योंकि वह सिर्फ़ माँ नहीं,
बल्कि एक संपूर्ण ब्रह्मांड है,
जो अपने बच्चों को हर अंधेरे से प्रकाश तक ले जाती है।

मंजुला शर्मा (अरुणिमा)

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