Ghaziabad :- अकेली माँ की यात्रा — छाया से प्रकाश तक(संस्मरण) जब वह गया…
घर की दीवारों में पहली बार सन्नाटा बोला।
छोटे-छोटे कदमों ने पूछा —
“माँ, अब कौन हमें स्कूल छोड़ने आएगा?”
और मैं…
आँसुओं को निगलकर बोली —
“अब माँ ही सब कुछ है…”
रातें लंबी होने लगीं,
दिन जिम्मेदारियों से भारी।
पैसे की गिनती,
किताबों की खरीद,
फीस की पर्चियाँ और अधूरे सपनों की थैली —
सब कंधों पर लटक गए।
पर माँ हार नहीं सकती थी —
क्योंकि बच्चे देख रहे थे उसे,
जैसे धरती को देखता है अंकुर —
कि अब बारिश कहाँ से आएगी।
धीरे-धीरे मैंने सीखा —
पिता बनकर भी माँ रहना।
डांटना भी, गले लगाना भी।
कठोर शब्दों में स्नेह छिपाना,
और टूटे मन को मुस्कान से ढक लेना।
बच्चों ने भी समझ लिया —
कि माँ का “ना” भी प्यार है,
और उसका “हाँ” भी दुआ।
कभी थक जाती हूँ,
तो खिड़की से झाँकती हूँ आसमान की ओर —
जहाँ शायद वे सुन रहे हैं
मेरे अधूरे संवाद,
मेरी मौन शिकायतें।
तब हवा कहती है —
“तुम अकेली नहीं, अजेय हो।”
आज जब बच्चे अपने पैरों पर खड़े हैं,
तो लगता है —
मेरी हर नींद-रहित रात
एक उजाले में बदल गई।
मैंने पिता का स्थान नहीं लिया,
पर अपने बच्चों के मन में
हिम्मत की परिभाषा जरूर लिख दी।
अब जीवन से शिकायत नहीं,
सिर्फ़ एक संतोष है —
कि मैंने आँसुओं से नहीं,
प्रेम और शक्ति से घर बनाया।
और जब कोई पूछता है —
“कैसे कर लिया इतना सब अकेले?”
तो मैं मुस्कुराकर कहती हूँ —
“माँ कभी अकेली नहीं होती…
वह तो हर बार, खुद ईश्वर का रूप बन जाती है।”
मंजुला शर्मा (अरुणिमा)
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