विकास की राह — सीमाओं से बाहर निकलो

Ghaziabad :- “विकास की राह — सीमाओं से बाहर निकलो”
अगर हम सचमुच अपना विकास चाहते हैं,
तो सबसे पहले —
हमें अपनी सीमाओं से बाहर निकलना होगा।
घर की चारदीवारी...
दोस्तों की चौकड़ी...
और मोबाइल की आभासी दुनिया —
यही तीन दीवारें हैं
जो हमें भीतर ही भीतर सीमित कर देती हैं।
हम सोचते हैं कि हम जी रहे हैं,
पर सच यह है —
हम बस दोहरा रहे हैं वही दिन,
वही बातें, वही आदतें,
जो हमें आगे नहीं, पीछे रोके हुए हैं।
जीवन का विस्तार तब शुरू होता है,
जब हम अपने आराम के घेरे से बाहर कदम रखते हैं।
जब हम नए लोगों से मिलते हैं,
नए विचारों को सुनते हैं,
और कभी अकेले भी किसी अनजाने रास्ते पर चलने की हिम्मत करते हैं।
मोबाइल बंद करो,
थोड़ी देर के लिए उस आभासी दुनिया से अलग हो जाओ,
और खुद से मिलो —
अपने भीतर के उस हिस्से से,
जो अब भी नया कुछ सीखना चाहता है,
जो अब भी बढ़ना चाहता है।
याद रखिए,
विकास वहीं होता है जहाँ जिज्ञासा होती है,
जहाँ डर नहीं — हिम्मत होती है,
और जहाँ मन कहता है —
“अब मैं अपने सीमाओं से बड़ा हो गया हूँ।”
तो आज से तय कीजिए —
चारदीवारी से बाहर निकलेंगे,
नए अनुभवों से खुद को समृद्ध करेंगे,
और जीवन को सिर्फ जिएंगे नहीं,
बल्कि निखारेंगे, विस्तार देंगे, ऊँचा उठाएँगे।
क्योंकि विकास बाहर नहीं —
आपके निर्णय के उस एक क्षण में छिपा है,
जब आप कहते हैं —
“अब मैं अपनी सीमाओं से मुक्त हूँ।” 
मंजुला शर्मा (अरुणिमा)

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