जब मन से रिश्तों का भाव निकल जाता है
Ghaziabad :- रिश्ते... जीवन के सबसे कोमल, फिर भी सबसे कठिन सूत्र हैं।
वे हमें जोड़ते भी हैं और बाँधते भी।
कभी ये रिश्ते जीवन का आधार बन जाते हैं,
और कभी यही रिश्ते मन के भीतर तूफ़ान उठा देते हैं।
पर एक दिन ऐसा आता है,
जब आत्मा सब अनुभवों से थककर भीतर लौट आती है।
वह अब किसी से कुछ नहीं चाहती —
न समझे जाने की अपेक्षा, न प्रेम की आकांक्षा।
बस मौन रहना सीख जाती है।
यह मौन कोई खोखलापन नहीं होता,
यह आत्मा की परिपक्वता होती है।
क्योंकि जब मन से रिश्तों का भाव निकल जाता है,
तो वहाँ दुःख के लिए कोई स्थान नहीं बचता।
जहाँ “मेरा” और “तेरा” समाप्त हो जाता है,
वहीं “शांति” का जन्म होता है।
अब जो कुछ भी होता है,
वह केवल साक्षी भाव से देखा जाता है।
कोई आता है — तो भी अच्छा,
कोई जाता है — तो भी ठीक।
अब कुछ भी भीतर हलचल नहीं करता,
क्योंकि मन जान चुका है —
सच्चे रिश्ते देह या शब्दों से नहीं, आत्मा के स्तर पर निभते हैं।
और जब आत्मा अपने आप से जुड़ जाती है,
तो उसे किसी बाहरी संबंध की आवश्यकता नहीं रहती।
वह पूर्ण हो जाती है — शांत, संतुलित, और स्वतंत्र।
यही वह क्षण होता है
जहाँ दुःख समाप्त होकर सत्य का आलोक जगमगाने लगता है।
जहाँ हर अनुभव, हर आघात
हमारे भीतर के ईश्वर का एक पाठ बन जाता है।
मंजुला शर्मा (अरुणिमा)
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