संदर्भ शिक्षक दिवस पर विशेष, गुरु शिष्य संबंध...तब और अब! :- सुधा शर्मा


बिलासपुर, छत्तीसगढ़ :- लो... फिर आ पहुंचा हम सबका चहेता शिक्षक दिवस! दिवस जो पुरानी पीढ़ी से यादों की पोटली खुलवाता है और नई को नवाचार का पाठ पढ़ने कहता है! यादें जो पुरातन सनातन परंपरा के गुरुस्थानों, आश्रमों से गुजरती है। जहां पग पग पर हैं इस रिश्ते की महक और गरिमा से पगे अनगिन किस्से! मर्यादा के प्रवाह और इसमें गोते लगाते सवाल जवाब! बहरहाल स्वतंत्रता के बाद देश के पहले उपराष्ट्रपति व दूसरे राष्ट्रपति डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जनम दिवस से जुड़े इस दिवस की महत्ता कई अर्थो में घर, समाज व देश हित के सरोकारों से वाबस्ता है। 

 *भारतीय संस्कृति का आध्यात्मिक आधार* 

सम्बंध जहाँ शिक्षक ज्ञान और मार्गदर्शन प्रदान करते हैं, और शिष्य श्रद्धा, समर्पण और सीखने के भाव से ज्ञान ग्रहण करते हैं। शिष्य जो अपने अनुभव और नैतिक मूल्यों से शिष्य को जीवन के सही मार्ग पर चलने को प्रेरित करते हैं, और शिष्य गुरु के प्रति पूर्ण सम्मान और विश्वास से इसे आत्मसात करते हैं। संक्षेप में इस रिश्ते का सार ज्ञान के आदान-प्रदान, आध्यात्मिक सिद्धि और उच्चतम आदर्शों की ओर बढ़ने का बेजोड़ माध्यम है। 

*पुरातन और नूतन परंपरा के बदलाव* 

प्राचीन भारत में गुरु-शिष्य संबंध निःस्वार्थ, स्नेहपूर्ण और पूरी तरह से समर्पित होता था। गुरु का ज्ञान और शिष्य की श्रद्धा इस संबंध की नींव थी। 
आज के भौतिकतावादी समाज में, यह संबंध अक्सर व्यवसाय के रूप में चौंकाता है। धन को महत्व दिए जाने से शिक्षकों और छात्रों के बीच का स्नेह, शिक्षक- शिष्य की आपसी श्रद्धा पर अब यह प्रश्नचिन्ह है। 

अब गुरु गूगल भए...एआई दे ज्ञान!
भावविह्वल संबंध का ना कोई स्थान!  

गूगल गुरु और एआई के संग अपडेट होने के संग आज कबीर वाणी में भी रमा जाए..
 कुछ दोहे प्रासंगिक होंगे...

​गुरु समान दाता नहीं, याचक शिष्य समान...
तीन लोक की सम्पदा, सो गुरु दीन्ही दान!

​गुरु कुम्हार, शिष्य कुंभ है... गढ़ि-गढ़ि काढ़ै खोट!
अन्तर हाथ देय सहारा, बाहर बाहै चोट!

सब धरती कागज करूं, लिखनी सब बनराय।
सात समुद्र की मसि करूं, गुरु गुण लिखा न जाय!

गुरु की आज्ञा आवै, गुरु की आज्ञा जाय!
कहैं कबीर सो संत हैं, आवागमन नशाय!

गुरु पारस को अन्तरो, जानत हैं सब सन्त।
वह लोहा कंचन करे, ये करि लये महन्त!

कुमति कीच चेला भरा, गुरु ज्ञान जल होय...
जनम-जनम का मोरचा, पल में डारे धोय!

गुरु गोविन्द दोऊ खड़े काके लागूं पाय...
बलिहारी गुरु आपनो जिन गोविंद दियो बताय!

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