इटावा प्रकरण घृणित अपराध:- सिकंदर यादव

Ghaziabad :-इटावा में कथावाचक के साथ हुई घटना ने पूरे देश को हिला दिया है, समझ में नहीं आता कि आखिर हम एक सभ्य समाज में संवैधानिक अधिकारों के साथ जी रहे हैं या वर्णवादी, मनुस्मृति के अनुसार, इस घटना को देखकर लगता है कि भारत में संविधान की जगह मनुविधान का शासन है, जिस प्रकार का दुस्साहस इन लोगों ने कथावाचकों के साथ किया है ऐसा तो तालिबान के राज में भी नहीं होता।
यूं तो हमारे देश में प्रतिदिन दलित उत्पीड़न की खबरें आती रहती हैं परंतु इस बार तो इन लोगों ने सीमा ही लग दी, क्या कोई सभ्य समाज इस बात को स्वीकार करेगा कि किसी व्यक्ति के "बाल मूड" कर उसे किसी स्त्री के मूत्र से पवित्र किया जाए, क्योंकि वो ब्राह्मण नहीं है, आखिर ये कौन-सा विधान है जो ब्राह्मणों को ये अधिकार देता है की कथा कौन करेगा कौन नहीं। भारत के संविधान में तो सबको समान अधिकार दिया गया है. ये जरूर है कि हजारों सालों से भारत के एक वर्ग द्वारा मनुस्मृति को आधार मानकर जाति व वर्ण के नाम पर शोषण करने का प्रयास होता रहा है. इसी वजह से बाबा साहेब ने मनुस्मृति का दहन किया था. परंतु आज वो कौन सी शक्ति है जो इन लोगों को वो बल दे रही है कि ये इस विधान को लागू करने की हिम्मत कर रहे हैं. इन लोगों को समझाना पड़ेगा कि देश संविधान से चलेगा ना कि मनु के विधान से. ये वही लोग हैं जो दलितों को घोड़ी नहीं चढ़ने देते, बाबा साहेब की यात्रा नहीं निकलने देते ओर तो ओर उन्हें मूंछ भी नहीं रखने देते। एक शंकराचार्य कहते हैं की कथा कहने का अधिकार सिर्फ ब्राह्मणों को है, उनसे कोई पूछे क्या ये संविधान में कहीं लिखा है. भारत का हर नागरिक अपना पेशा चुनने के लिए स्वतंत्र है, इन शंकराचार्य के साथ यदि कोई घटना घट जाए तो ये कानून के पास जाते हैं, जब इन्हें मनु का विधान याद नहीं आता. उत्तर प्रदेश में यादव की संख्या सबसे ज्यादा है उन्हें ये निर्णय लेना चाहिए कि उन्ही के कुल देवता की कथा कहने से उन्हें कौन रोक सकता है. यादव समाज को इकट्ठा होकर इन धर्म के ठेकेदारों के सभी कर्मकांडों का बहिष्कार करना चाहिए।
यादवों के कुल देवता श्री कृष्ण के सभी मंदिरों पर इनका एकाधिकार क्यों है, हमारे देवता के नाम पर चढ़ना खाएंगे और हमसे ही घृणा करेंगे। समस्त यादव समाज को चाहिए कि वो ऐसे किसी आयोजन में ना चंदा ना इनसे कर्मकांड कराये, जो लोग इस प्रकार की सोच रखते हैं. और जो भी श्री कृष्ण के मंदिर है,वहां से इन लोगों को हटाने का आंदोलन किया जाए, तब इन लोगों को पता चलेगा कि भेदभाव क्या होता है. इस घटना पर भारत सरकार को भी संज्ञान लेना चाहिए कि आखिर इन लोगों की हिम्मत कैसे हो रही है. उत्तर प्रदेश में इस प्रकार का जातीय विभेद करके एक समाज को अपमानित किया जा रहा है अन्यथा ये एक बड़े आंदोलन में बदल जाएगा।